राष्ट्रीय युवा दिवस
प्रेम प्रकाश उपाध्याय “नेचुरल” पिथौरागढ़
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राष्ट्रीय युवा दिवस केवल एक स्मृति-दिवस नहीं है, बल्कि यह आज के भारत के लिए एक असहज प्रश्न है। सवाल यह नहीं कि हमने कितनी ऊँची इमारतें खड़ी कर लीं या कितनी तेज़ तकनीक अपना ली, सवाल यह है कि क्या हमने उतने ही मजबूत मन, स्पष्ट विवेक और जिम्मेदार नागरिक भी गढ़े हैं? भौतिक प्रगति के शोर में आध्यात्मिक और नैतिक पतन की आहट साफ़ सुनाई दे रही है।
आज का युवा संसाधनों से समृद्ध है, लेकिन दिशा से वंचित। हाथ में मोबाइल है, पर मन में स्थिरता नहीं। अवसर अनेक हैं, पर उद्देश्य धुंधला। सफलता की परिभाषा सिमटकर पैकेज, पद और प्रदर्शन तक रह गई है। ऐसे समय में स्वामी विवेकानंद की चेतावनी और भी तीखी लगती है—कि शक्ति बिना चरित्र के विनाश बन जाती है।
स्वामी विवेकानंद ने कभी सुविधा का उपदेश नहीं दिया। उन्होंने संघर्ष, अनुशासन और आत्मबल की बात की। उनका स्पष्ट मत था कि जो समाज कमजोर, भयभीत और स्वार्थी युवाओं पर टिका हो, वह अधिक समय तक खड़ा नहीं रह सकता। आज जब प्रतिस्पर्धा करुणा को कुचल रही है और उपभोग विवेक का स्थान ले रहा है, तब उनका कथन—“दरिद्र नारायण की सेवा ही ईश्वर की सच्ची पूजा है”—हमारी नीतियों और प्राथमिकताओं पर सीधा प्रहार करता है।
1893 में शिकागो में दिया गया उनका भाषण केवल भारत की पहचान नहीं था, वह दुनिया के लिए एक वैचारिक विकल्प था—सहिष्णुता बनाम कट्टरता, संवाद बनाम टकराव। आज जब समाज वैचारिक ध्रुवीकरण और असहिष्णुता की ओर बढ़ रहा है, तब विवेकानंद का दर्शन हमें आईना दिखाता है कि आध्यात्मिकता समाज को जोड़ती है, तोड़ती नहीं।
दुखद यह है कि हमने स्वामी विवेकानंद को मूर्ति और पोस्टर तक सीमित कर दिया है, जबकि उनके विचार हमारी शिक्षा, राजनीति और सामाजिक जीवन से लगातार बाहर होते जा रहे हैं। राष्ट्रीय युवा दिवस भाषणों और औपचारिक कार्यक्रमों में सिमट गया है, जबकि असली जरूरत आत्ममंथन की है—क्या हम ऐसा भारत बना रहे हैं, जिसकी कल्पना विवेकानंद ने की थी?
वास्तविक राष्ट्रनिर्माण सड़कें और बाजार खड़े करने से नहीं, बल्कि निर्भीक, संवेदनशील और जिम्मेदार युवाओं के निर्माण से होता है। जब तक भौतिक समृद्धि को नैतिक उद्देश्य से नहीं जोड़ा जाएगा, तब तक विकास खोखला ही रहेगा।
राष्ट्रीय युवा दिवस हमें याद दिलाता है कि भारत को केवल तेज़ नहीं, संतुलित बनना है—जहाँ शक्ति के साथ विवेक हो, सफलता के साथ सेवा हो और समृद्धि के साथ अर्थ हो। यही स्वामी विवेकानंद को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
