देश के बहुचर्चित लेखक एवं साहित्य अकादमी के बाल साहित्य पुरस्कार से सम्मानित
*प्रोफेसर (डॉ.) दिनेश चमोला ‘शैलेश’ के सृजन-मूल्यांकन* पर आधारित श्रृंखला का *चौबीसवां (24वां)* ऑनलाइन व्याख्यान आज *दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास* के संयोजन में उनके चर्चित आध्यात्मिक हिंदी लेख संग्रह *’काया की माया’* पर केंद्रित रहा ।
समारोह के *अध्यक्ष* के रूप में *बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, भोपाल* (म.प्र.) के कुलपति, *प्रोफ़ेसर एस के जैन* रहे । प्रो जैन ने विभिन्न विधाओं में राष्ट्रीय स्तर पर सार्थक व बहुआयामी लेखन करने वाले साहित्यकार प्रो. चमोला को बधाई देते हुए उनके सोद्देश्यपूर्ण लेखन की सराहना की तथा प्रचार सभा के इस उद्यम को उत्प्रेरक माना ।
आज समाज में इस प्रकार की व्यावहारिक लेखन की न केवल उपादेयता है, बल्कि आज के समय में इसकी गहन आवश्यकता भी है। इस प्रकार का लेखन व्यक्तित्व निर्माण के साथ-साथ चरित्र निर्माण, सकारात्मक सोच व ऊर्जामय वातावरण के निर्माण करने में सहायक है । कथा, कहानी, नाटक, उपन्यास आदि विभिन्न माध्यमों से जिन मुहावरों की तलाश प्रो. चमोला ने अपने सात दर्जन से अधिक पुस्तकों वाले साहित्य में की है, निश्चित रूप से वह न केवल पठनीय है, बल्कि जीवन में अनुकरणीय भी है । हम सबको ऐसा साहित्य पढ़ना चाहिए । रचनाकार के ऐसे श्रेष्ठ रचनाकर्म की मार्केटिंग होनी भी आवश्यक है ।
*केरल विश्वविद्यालय* के हिंदी के प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, *प्रो.के जी हेरमन,* ने विशिष्ट अतिथि के रूप में रचनाकार के विशिष्ट साहित्यिक अवदान पर प्रकाश डालते हुए कहा कि उनके इस संग्रह के लेख आज के युवाओं में मूल्यवर्धन एवं चरित्र निर्माण में सहायक हैं तथा ये रचनाएं आज के समय की मांग हैं । इनका साहित्य पाठक, विद्यार्थी, शोधार्थी के साथ-साथ सभी के लिए नवीन चिंतन, दर्शन, नई ऊर्जा का कार्य कर रहा है। इनका लेखन न केवल उत्प्रेरित करने वाला है अपितु अनुकरणीय भी है । आदर्श जीवन जीना आजकल के अत्यंत समय में अत्यंत चुनौतीपूर्ण है । ऐसे वातावरण में ऐसा साहित्य बहुत ही उपादेय एवं जीवनीशक्ति प्रदान करने वाला है । संतो के संग रहने से ही उनके साहित्य में भी संत साहित्य की सी दूरदर्शिता एवं लोक कल्याण की पवित्र भावना समाहित है जो राष्ट्र चिंतन, राष्ट्र के वास्तविक निर्माण के लिए बहुत आवश्यक है ।
प्रो. सुमा टी रोडणवर , प्रोफेसर, हिंदी स्नातकोत्तर विभाग, मंगलौर विश्वविद्यालय, (कर्नाटक) *आमंत्रित विद्वान* के रूप में कहा कि बिना अध्यात्म के, जीवन के असली मर्म को नहीं समझा जा सकता है । यह पुस्तक ज्ञान का भंडार है, इस तरह की पुस्तकें ही देश, युवाओं और जीवन को नए चिंतन, नई दिशा एवं नवोन्मेषी की नई रौशनी प्रदान कर सकतीं हैं ।
लेखकीय वक्तव्य के रूप में प्रो चमोला ने अध्ययन-अध्यापन के मार्ग को लंबा, जटिल व श्रमसाध्य कार्य बताया । पवित्रता से किए जाने पर साधना अवश्य फलीभूत होती है ।
प्रो. मंजुनाथ एवं उनकी टीम बधाई की पात्र है । संचालन विनीता सेतुमाधवन, रीना संधू ने किया ।
ध्यातव्य है कि 14 जनवरी, 1964 को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जनपद के ग्राम कौशलपुर में स्व.पं. चिंतामणि चामोला ज्योतिषी एवं श्रीमती माहेश्वरी देवी के घर मेँ जन्मे प्रो. चमोला ने शिक्षा में प्राप्त कीर्तिमानों यथा एम.ए. अंग्रेजी, प्रभाकर; एम. ए. हिंदी (स्वर्ण पदक प्राप्त); पीएच-डी. तथा डी.लिट्. के साथ-साथ साहित्य के क्षेत्र में भी राष्ट्रव्यापी पहचान निर्मित की है।
पिछले चवालीस (44) वर्षों से देश की अनेकानेक पत्र-पत्रिकाओं के लिए अनवरत लिखने वाले चर्चित साहित्यकार, प्रो.चमोला राष्ट्रीय स्तर पर साठ से अधिक सम्मान व पुरस्कार प्राप्त कर चुके हैं व सात दर्जन से अधिक मौलिक पुस्तकों के लेखक के साथ-साथ हिंदी जगत में अपने बहु-आयामी लेखन व हिंदी सेवा के लिए सुविख्यात हैं ।
अभी तक प्रो. चमोला ने उपन्यास, कहानी, दोहा, कविता, एकांकी, बाल साहित्य, समीक्षा, शब्दकोश, अनुवाद, व्यंग्य, खंडकाव्य, व्यक्तित्व विकास, लघुकथा, साक्षात्कार, स्तंभ लेखन के साथ-साथ एवं साहित्य की विविध विधाओं में लेखन किया है ।
आपकी चर्चित पुस्तकों में ‘यादों के खंडहर, ‘टुकडा-टुकड़ा संघर्ष, ‘प्रतिनिधि बाल कहानियां, ‘श्रेष्ठ बाल कहानियां, ‘दादी की कहानियां¸ नानी की कहानियां, माटी का कर्ज, ‘स्मृतियों का पहाड़, ’21श्रेष्ठ कहानियां‘ ‘क्षितिज के उस पार, ‘कि भोर हो गई, ‘कान्हा की बांसुरी, ’मिस्टर एम॰ डैनी एवं अन्य कहानियाँ,‘एक था रॉबिन, ‘पर्यावरण बचाओ, ‘नन्हे प्रकाशदीप’, ‘एक सौ एक बालगीत, ’मेरी इक्यावन बाल कहानियाँ, ‘बौगलु माटु त….,‘विदाई, ‘अनुवाद और अनुप्रयोग, ‘प्रयोजनमूलक प्रशासनिक हिंदी, ‘झूठ से लूट’, ‘गायें गीत ज्ञान विज्ञान के’ ‘मेरी 51 विज्ञान कविताएँ’ तथा ‘व्यावहारिक राजभाषा शब्दकोश’ आदि प्रमुख हैं। हाल ही में आपकी अनेक पुस्तकें- ‘सृजन के बहाने: सुदर्शन वशिष्ठ’; ’21 श्रेष्ठ कहानियां’ (कहानियां); ‘बुलंद हौसले’ (उपन्यास); ‘पापा ! जब मैं बड़ा बनूंगा’; ‘मेरी दादी बड़ी कमाल’ (बाल कविता संग्रह) तथा ‘मिट्टी का संसार’ (आध्यात्मिक लघु कथाएं) आदि प्रकाशित हुई हैं।
प्रो. चमोला ने 22 वर्षों तक चर्चित हिंदी पत्रिका “विकल्प” का भारतीय पेट्रोलियम संस्थान, देहरादून से संपादन किया है तथा दो बार इस पत्रिका को भारत के राष्ट्रपति के हाथों प्रथम व द्वितीय पुरस्कार दिलाया है । आप देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों, आयोगों व संस्थानों की शोध समितियों ; प्रश्नपत्र निर्माण व पुरस्कार मूल्यांकन समितियों के सम्मानित सदस्य/विशेषज्ञ हैं।
*प्रो. (डॉ.) दिनेश चमोला ‘शैलेश* ‘*, डी.लिट्,
