उस दिन दोपहर के करीब का समय था। मैं घर पर थी, विद्यालय से बेटी की परीक्षाओं के कारण छुट्टी ली हुई थी। तभी सहकर्मी दिव्या का फोन आया —
“ दीपा मैडम, क्या आपके पास सेफ्टी पिन है? एक बच्ची की पैंट फट गई है, वह बहुत असहज महसूस कर रही है।”
उनकी आवाज़ में बेचैनी झलक रही थी। मैंने कहा, “मैडम, मैं विद्यालय परिसर में ही तो रहती हूं, कोई बात नहीं — आप किसी को भेज दीजिए, मैं अपनी बेटी की पैंट देती हूं और उसकी पैंट को सिलकर वापस कर देती हूं।” थोड़ी देर में आशा दीदी आईं। बोलीं, “मैडम, लड़की आपकी बेटी से थोड़ी ज्यादा मजबूत है, उसकी पैंट फट गई है। वह बाथरूम में बैठी है, बाहर निकलने से झिझक रही है।”
मैंने तुरंत अपने कमरे की अलमारी खोली और अपनी बेटी का एक पैंट निकाली — “यह दे दो, ताकि वो अस्थायी रूप से बदल ले। फिर उसकी पैंट ले आओ, मैं सिल देती हूं।”जब तक दीदी वापस लौटीं, मैंने सोचा — मनुष्य का जीवन कितना अजीब है; कोई छोटी-सी स्थिति और हम सब एक-दूसरे के सहारे बन जाते हैं। मैं चाय बना चुकी थी। दीदी आईं, उन्होंने बच्चे की फटी पैंट मुझे दी। वह ऊपर से घुटनों तक फटी थी। साथ ही मैंने देखा कि बच्ची ने बेल्ट की जगह कुछ सिलकर पैंट को किसी तरह फिट किया था — शायद घर की तंगी या असुविधा ने उसे ऐसा करने को मजबूर किया होगा।मैंने ध्यान से सिलाई की, टांके ठीक किए और कपड़ा मजबूत किया। काम पूरा होने पर पैंट दीदी को वापस दी और चाय का प्याला बढ़ा दिया। उन्होंने मुस्कराकर चाय ली और बोलीं, “दीदी, बहुत काम आ गया आपका यह सहयोग।”
उनके जाने के बाद मेरा मन शांत नहीं हुआ। भीतर एक हलचल-सी थी। अचानक विचार आया — “क्या उस बच्ची को पता है कि मैंने उसकी मदद की? वो अगर मुझसे मिल जाए, तो शायद धन्यवाद कहे?”और तब मेरे भीतर से एक आवाज़ आई — “क्या तूने मदद इसलिए की थी कि कोई धन्यवाद कहे?”
यह प्रश्न भीतर तक उतर गया। हम अक्सर सोचते हैं कि दूसरों के लिए कुछ करने पर हमें सराहना मिले। पर क्या भलाई की कीमत आभारी शब्दों में चुकाई जानी चाहिए?मुझे अपने दादाजी की शिक्षा याद आई — “दान वही सच्चा है, जिसमें देने वाला ही भूल जाएं कि दान हुआ।” वे कहते थे कि मंदिर में दान देने के बाद नाम की घोषणा करवाना उस पुण्य को आधा कर देता है, क्योंकि फिर वह निःस्वार्थ नहीं रहता।आज समय बदल गया है। लोग सहायता भी कैमरे के सामने करते हैं, ताकि दुनिया देखे कि वे “अच्छे इंसान” हैं। सोशल मीडिया भरा पड़ा है “दान की तस्वीरों” से। लेकिन क्या यह मदद वास्तव में सहानुभूति से भरी होती है, या बस छवि सुधारने का एक तरीका बनकर रह गई है?
कई बार सोचती हूं, जब कोई व्यक्ति सड़क पर किसी को खाना देकर फोटो खिंचवाता है — तो क्या वह भूखा व्यक्ति खुश होता है या शर्मिंदा महसूस करता है कि उसकी मजबूरी अब “पोस्ट” बन गई है?सहायता का अर्थ केवल देना नहीं, उस व्यक्ति की गरिमा बचाना भी है। असली भलाई वही है जो नज़रों से ओझल हो पर दिलों में असर छोड़ जाए। जैसे कि बारिश की बूंदें — वे शोर नहीं करतीं, बस धरती को सींच जाती हैं।ईश्वर हमें रोज़ कुछ न कुछ देता है — हवा, पानी, स्वास्थ्य, अवसर — और कभी आभार नहीं मांगता। अगर सर्वोच्च दाता मौन रह सकता है, तो हम क्यों नहीं?
शायद सच्चा परोपकार वही है जब हम मदद करें और भूल जाएं कि की थी, बस एक संतोष रह जाए कि किसी का संकोच, किसी की असुविधा थोड़ी कम हो गई।नेकी करो… दरिया में डालो।
दीपा कुमारी
स्नातकोत्तर शिक्षिका
पीएम श्री के. वि. भा. सै. अका. देहरादून।
