अपने जुनून से अपने हुनर को तराशे.

अपने जुनून से अपने हुनर को तराशे.

समय बदल रहा है और उसके साथ हमारी शिक्षा प्रणाली भी। लेकिन विडंबना देखिए बदलाव सुविधा का नहीं, दबाव का हुआ है। कभी शिक्षा बच्चे के स्वाभाविक विकास का माध्यम हुआ करती थी; आज वही शिक्षा बच्चों की मासूमियत, तनाव और भविष्य पर बोझ बनकर टूट रही है।

शिक्षा जीवन बनाती थी, बोझ नहीं.

दो दशक पहले सरकारी स्कूलों का समय था। वहाँ शिक्षक बच्चे की योग्यता को पहचानते थे।
हर छात्र को विज्ञान, इंजीनियरिंग या मेडिकल,वाणिज्य की दौड़ में नहीं धकेला जाता था। जिन्हें विज्ञान नहीं सूट करता था, उन्हें कला, वाणिज्य या किसी कौशल आधारित क्षेत्र की ओर भेज दिया जाता—जैसे पानी को कई नहरों में बाँट दिया जाए ताकि जीवन में बाढ़ न आए।

शिक्षा तब प्राकृतिक थी साधारण पर गहरी।

शारीरिक अनुशासन था, खेलकूद था, मिट्टी थी, गिरना-पड़ना था और वहीं से आत्मविश्वास भी।
माता-पिता और शिक्षक साथ मिलकर बच्चों को मजबूत बनाते थे मानसिक रूप से भी, शारीरिक रूप से भी।
दसवीं तक पहुँचते-पहुँचते बच्चा सचमुच लोहा बन जाता तनाव झेलने वाला, धरातल पर खड़ा, जीवन का मुकाबला करने के लिए तैयार।

आधुनिक दौर: ब्रांडेड शिक्षा का बोझ और सिंथेटिक सपने.

लेकिन समय बदला… और शिक्षा स्कूलों से निकलकर ब्रांडेड शोरूमों में पहुँच गई। अब बच्चा नहीं, बल्कि माता-पिता के सपने पढ़ते हैं।
50% वाला भी जबरदस्ती साइंस…
कमजोर बच्चा भी कोचिंग की मैराथन में धकेला जाता है…
और हर घर में नारा
“हमारा बेटा डॉक्टर बनेगा… IIT जाएगा…”
गूंजता हैं।

शिक्षक यदि थोड़ी सी भी सख्ती दिखा दें, तो माता-पिता मीडिया और कानून लेकर स्कूल पर चढ़ जाते हैं।
यहीं से बच्चा टेडी बियर की तरह नाज़ुक हो गया
और न मार सहने की क्षमता,न तनाव झेलने की शक्ति,न खेलकूद,न खुलापन,सिर्फ किताबें… कोचिंग… और कॉम्पटीशन का चक्रव्यूह।

यही सिंथेटिक शिक्षा सबसे बड़ा खतरा है।
जो बच्चा जीवन को नहीं समझ पाता, वह बड़ी डिग्री लेकर भी छोटा इंसान बन जाता है।

सफलता की असल परिभाषा: हुनर, योग्यता और जुनून.

हर बच्चा इंजीनियर या डॉक्टर आईएस, आईपीएस बनने के लिए पैदा नहीं होता।
सफल वह है—जो अपनी रुचि को पहचानकर उसे हुनर में बदल दे।

एक साधारण जूता रिपेयर करने वाला लड़का महीने का चालीस पचास हजार रुपये कमाता मिलता हैं.
न वह कोटा गया, न कोई ब्रांडेड स्कूल।
लेकिन वह अपने काम में मास्टर है।
देश भर में हजारों लोग हैं
जो शेफ बनकर,
हलवाई बनकर,
दुकानदारी, डेयरी, फर्नीचर या कंस्ट्रक्शन में
लाखों रुपये कमा रहे हैं।
सिद्धांत साफ है—
डिग्री नहीं, योग्यता कमाती है।
कोचिंग नहीं, कौशल जीवन बनाता है।

बच्चों को दबाव नहीं, दिशा दीजिए.

माता-पिता को समझना होगा बच्चा आपकी अधूरी इच्छाओं को पूरा करने का औजार नहीं है।
वह अपनी राह बनाने वाला एक स्वतंत्र व्यक्तित्व है।

उसे सिर्फ एक ही भट्टी में मत झोको।
उसे नियंत्रित पानी की तरह बहने दो—
वह अपना रास्ता खुद बनाएगा,
और सफलता उसे खुद बुलाकर ले जाएगी।

हाँ, नियंत्रण जरूरी है अनियंत्रित पानी बाढ़ लाता है।
लेकिन अत्यधिक दबाव भी बच्चे को तोड़ देता है।

नेचुरल शिक्षा ही असली शिक्षा है

बच्चे को सिंथेटिक न बनाइए,
उसे नेचुरल रहने दें,
हुनर की तरफ बढ़ने दें,
अपने सपनों को जीने दें। कौशलम ही उसके जीवन की दैनिक सच्चाई हैं.

शिक्षा वही सार्थक है—
जो बच्चे को मजबूत इंसान बनाए,
संतुलित जीवन दे,
और एक बेहतर नागरिक तैयार करे।
एक ही लक्ष्य रखिए—
बच्चा डॉक्टर नहीं,
सबसे पहले अच्छा इंसान बने।

यही असली शिक्षा है।
यही जीवन का सबसे बड़ा ज्ञान हैं।

प्रेम प्रकाश उपाध्याय “नेचुरल” उत्तराखंड
(लेखक शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ है)

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