11 दिसंबर को श्री रजनीश ध्यान मंदिर, सोनीपत में ओशो के जन्मदिवस के अवसर पर स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी के मार्गदर्शन और मां अमृत प्रिया जी के मधुर भक्ति-संगीत के साथ भव्य एवं ऊर्जावान उत्सव का आयोजन किया गया। लगभग 1300 साधकों ने पूरे देश से पहुँचकर इस आध्यात्मिक उत्सव को एक जीवंत पर्व का स्वरूप दिया।

स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी का प्रेरणादायी प्रवचन
स्वामी शैलेन्द्र सरस्वती जी ने अपनी सहज, गहन और आधुनिक मन को समझने वाली भाषा में साधकों को भीतर लौटने, ध्यान अपनाने और जीवन को उत्सव की तरह जीने का संदेश दिया।
स्वामी जी ने कहा:
“ध्यान कोई विश्वास नहीं—यह एक विज्ञान है। जब भीतर शांति उतरती है, तभी जीवन उत्सव बनता है। ओशो व्यक्ति नहीं, एक चेतना हैं—और उस चेतना को अपने भीतर जगाना ही असली जन्मदिवस है।”
उनका संदेश आज के मन के लिए अत्यंत प्रासंगिक था—ध्यान को वैज्ञानिक प्रयोग, स्वतंत्रता को आध्यात्मिकता का आधार, और अनुभव को सत्य की कसौटी बताते हुए।
ओशो अतीत के बुद्धपुरुषों से कैसे भिन्न हैं? — स्वामी शैलेन्द्र जी द्वारा व्यक्त दृष्टि
1. आधुनिक भाषा और मनोविज्ञान
ओशो ने प्राचीन आध्यात्मिक सूत्रों को आज की भाषा, मनोविज्ञान और जीवन-शैली की समझ से जोड़ा—जिससे सत्य सहज और प्रयोग योग्य बना।
2. ध्यान को विज्ञान की तरह प्रस्तुत करना
ओशो ने ध्यान को कोई धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि एक वैज्ञानिक प्रयोग बताया—जिसे हर व्यक्ति स्वयं परख सकता है।
3. धर्म-रहित आध्यात्मिकता
ओशो किसी धर्म के प्रवक्ता नहीं थे; वे सभी परंपराओं—बुद्ध, कृष्ण, यीशु, लाओत्से—के सार को एक साथ रखकर कहते थे कि सत्य किसी का निजी स्वामित्व नहीं।
4. व्यक्ति की स्वतंत्रता पर जोर
ओशो किसी अंधानुकरण की अपेक्षा नहीं करते। उनका संदेश है—
“मेरे शब्दों को मत मानो, स्वयं अनुभव करो।”
5. टैबू विषयों पर निर्भीकता
सेक्स, प्रेम, समाज, देह—जिन विषयों पर अतीत के गुरु मौन रहे, ओशो ने उन पर वैज्ञानिक, मनोवैज्ञानिक और स्पष्ट शैली में बात की।
6. ध्यान + उत्सव का अनोखा संयोग
नृत्य, संगीत, कैथार्सिस, मौन—ओशो ने ध्यान को उत्सव बना दिया।
उन्होंने तपस्या की जगह आनंद और celebration रखा।
7. जीवन-स्वीकृति
ओशो जीवन को त्यागने की नहीं, उसे पूर्णता से अपनाने की बात करते हैं—
“Zorba the Buddha” इसका जीवंत प्रतीक है।
8. अंधविश्वासों की आलोचना
ओशो ने पुरानी दमनकारी संरचनाओं और पाखंडों पर तार्किक और निर्भीक दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
मां अमृत प्रिया जी के दिव्य भजन
कार्यक्रम में मां अमृत प्रिया जी ने अपनी मधुर, आत्मीय और भक्ति से भरी आवाज़ में ओशो को समर्पित गीत प्रस्तुत किए।
उनकी गायकी ने पूरे ध्यान मंदिर में भक्ति, प्रेम और शांति की दिव्य तरंगें भर दीं।
सैकड़ों साधकों ने भाव-विभोर होकर इस संगीत को ध्यान की अनुभूति के रूप में अनुभव किया।
स्वामी जी ने अपने प्रवचन के उपरांत साधकों के बीच गहन ऊर्जा का सामूहिक शक्तिपात भी प्रदान किया। इस दौरान पूरा वातावरण ध्यान, मौन और आंतरिक ऊर्जा से भर गया। अनेक साधकों ने इस शक्तिपात को भीतर उतरती शांति और चेतना के जागरण की अनुभूति के रूप में महसूस किया।

यह ओशो जन्मदिवस उत्सव केवल एक स्मरण नहीं था—यह एक जीवित अनुभव था जिसमें
ज्ञान, ध्यान, संगीत और उत्सव
एक साथ खिल उठे।
ओशो का संदेश आज भी सरल, आधुनिक और शाश्वत है— धर्म नहीं, धार्मिकता; भगवान नहीं, भगवत्ता; विश्वास नहीं, अनुभव।
