कुमाऊँनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए

कुमाऊँनी भाषा को संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया जाए

सम्मेलन में उठी प्रबल मांग।

– प्रेम प्रकाश उपाध्याय “नेचुरल”, बागेश्वर

“भाषा ही अस्मिता की आत्मा है, और जो अपनी भाषा को बचा लेता है, वह अपनी पहचान को अमर कर देता है।”
इसी भावना की गूंज राष्ट्रीय कुमाऊँनी भाषा सम्मेलन में गहराई से सुनाई दी।प्रतिवर्ष अलग अलग जगह होने वाले इस सम्मेलन में इस बार शैक्षणिक विमर्श ही नहीं, बल्कि भाषा, संस्कृति और आत्मगौरव का एक उत्सव बन गया — जो आगे चलकर एक ऐसे आंदोलन का रूप लेता दिखा जिसमें कुमाऊँनी भाषा को शिक्षा, प्रशासन और सार्वजनिक जीवन में उचित स्थान दिलाने की मांग प्रमुख रही।
सम्मेलन में न्यायपालिका, प्रशासन, शिक्षाजगत और नागरिक समाज के अनेक प्रबुद्ध जनों ने भाग लेकर इस मुद्दे पर एकजुटता प्रदर्शित की।
सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश न्यायमूर्ति प्रफुल्ल चंद्र पंत ने कहा,
“हमारी मातृभाषाएँ — कुमाऊँनी और गढ़वाली — उत्तराखंड की अस्मिता की जड़ें हैं। अब समय आ गया है कि सरकार इन्हें केवल सांस्कृतिक विषय न माने, बल्कि प्रशासनिक और शैक्षणिक दर्जा प्रदान करे।”
उन्होंने कुमाऊँनी भाषा की मानक व्याकरण और शब्दावली के निर्माण हेतु एक संयुक्त समिति गठित करने का प्रस्ताव भी रखा, ताकि इसे विद्यालयों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जा सके।
तीन दिनों तक चले इस सम्मेलन में भाषाविदों, साहित्यकारों और शोधकर्ताओं ने कुमाऊँनी भाषा की व्याकरण, ध्वन्यात्मक संरचना और बोलियों की विविधता पर शोधपत्र प्रस्तुत किए।
पंतनगर विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो. डी.एस. बिष्ट ने बताया कि कुमाऊँनी भाषा संस्कृत और अपभ्रंश से विकसित हुई है तथा इसमें आज भी सैकड़ों मूल शब्द सुरक्षित हैं, जो इस क्षेत्र के प्राकृतिक जीवन, कृषि और दर्शन को प्रतिबिंबित करते हैं।
सम्मेलन में दो प्रमुख प्रस्ताव पारित किए गए।
कुमाऊँनी व्याकरणिक संकलन का निर्माण।
लोककथाओं और मौखिक परंपराओं का संकलन, जिसे देहरादून स्थित उत्तराखंड भाषा संस्थान को प्रस्तुत किया जाएगा। सोशल मीडिया में # Kumaoni
Language Conference ट्रेंड करता रहा, और सैकड़ों युवाओं ने कुमाऊँनी गीत, कहावतें व कविताएँ साझा कर अपनी भाषा के प्रति नए आत्मगौरव का प्रदर्शन किया। सभी वक्ताओं ने निम्न बिंदुओं पर सांझा सहमति प्रस्तुति की।
कुमाऊँनी को राज्य की द्वितीय राजभाषा घोषित किया जाए।
कक्षा 1 से 5 तक वैकल्पिक विषय के रूप में शामिल किया जाए।
क्षेत्रीय भाषाओं के लिए शिक्षक प्रशिक्षण कार्यक्रम प्रारंभ किए जाएँ।
उत्तराखंड भाषा संस्थान के लिए बजट और संसाधनों में वृद्धि की जाए।
कुमाऊँनी फिल्म, रंगमंच, संगीत और साहित्य को प्रोत्साहन हेतु वार्षिक राज्य पुरस्कार आरंभ किए जाएँ।
कुमाऊनी भाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल कराना उत्तराखंड की सांस्कृतिक पुनर्जागरण का प्रतीक होगा। कुमाऊँनी बोली केवल अभिव्यक्ति का माध्यम नहीं, बल्कि लोकबुद्धि, संवेदना और परंपराओं की जीवंत धरोहर है। आयोजक
डॉ. चंदोला ने सांस्कृतिक संरक्षण को पर्यावरणीय चेतना से जोड़ने की बात कहीं।
सम्मेलन उत्तराखंड भाषा संस्थान के सदस्य और ‘पहाड़ु’ पत्रिका के संपादक डॉ. हयात सिंह रावत के निर्देशन में किया गया। साहित्यकार मोहन जोशी सहित अनेक शिक्षाविद्, लेखक, और नागरिकों ने उत्साहपूर्वक भाग लिया।

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